दिल्ली—भारत की गर्वपूर्ण राजधानी—आज विकास, संस्कृति, शिक्षा, प्रशासन, राजनीति और व्यापार का सबसे प्रमुख केंद्र है। हवा में कणीय पदार्थों की अत्यधिक मात्रा, वाहनों का बढ़ता बोझ, पराली का धुआँ, औद्योगिक उत्सर्जन और अव्यवस्थित शहरीकरण ने दिल्ली की हवा को सांस लेने योग्य नहीं छोड़ा है। लेकिन इस चमक-धमक के पीछे एक बड़ा संकट धीरे-धीरे शहर की साँसों को रोक रहा है—प्रदूषण
भूमिका
भारत की राजधानी दिल्ली, दुनिया के उन महानगरों में शामिल है जो तेज़ी से विकसित तो हुए हैं, लेकिन आज पर्यावरण प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। दिल्ली न सिर्फ देश की राजधानी है, बल्कि शिक्षा, व्यापार, पर्यटन और रोज़गार का भी प्रमुख केंद्र है। लेकिन पिछले कई वर्षों से यह शहर वायु प्रदूषण के लिए विश्व स्तर पर कुख्यात हो चुका है। हर वर्ष सर्दियों के मौसम में दिल्ली की हवा इतनी ख़राब हो जाती है कि ‘दिल्ली स्मॉग’ एक अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाता है। लोग बाहर निकलने से डरते हैं, अस्पतालों में मरीजों की भीड़ बढ़ जाती है और AQI ‘गंभीर’ श्रेणी से आगे निकल जाता है। दिल्ली का प्रदूषण सिर्फ एक मौसमी चुनौती नहीं है, बल्कि यह जीवनशैली, अव्यवस्थित शहरीकरण, साइंटिफिक इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, प्रदूषण नियंत्रण नीतियों की असफलता और मानव लापरवाही का संयुक्त परिणाम है। यह समस्या केवल हवा तक सीमित नहीं है; इसमें जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, निर्माण प्रदूषण, कचरा समस्या, वाहन प्रदूषण और औद्योगिक प्रदूषण के अलावा निम्न कारण शामिल हैं:
- लाखों वाहन
- तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या
- धूल, निर्माण गतिविधियाँ
- पराली का धुआँ, औद्योगिक गैसें
- मौसम और भौगोलिक परिस्थितियाँ
दिल्ली में प्रदूषण: इतिहास और पृष्ठभूमि
1980 का दशक: वाहन वृद्धि की शुरुआत:
- दिल्ली की आबादी लगभग 50 लाख।
- वाहन कम, लेकिन बढ़ने लगे।
- साधारण प्रदूषण बढ़ने लगा था।
1990–2000: औद्योगीकरण और वाहनों का विस्फोट:
- दिल्ली की आबादी 1 करोड़ के आसपास पहुँचने लगी।
- लाखों वाहनों का प्रवेश।
- सड़कों में धूल-धक्कड़ बढ़ी।
- सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में CNG बसें लागू करने का आदेश दिया
2005–2015: निर्माण और शहरी विस्तार:
- मेट्रो का विस्तार
- नई कॉलोनियाँ और अपार्टमेंट
- फ्लाईओवर, सड़कों का विस्तार
- इस दशक में धूल प्रदूषण सबसे तेजी से बढ़ा।
2016–2024: पराली का संकट + मौसम परिवर्तन:
- धुंध, धुआँ
- ठंडी हवाओं का रुकना
- पराली जलाना, यातायात बढ़ना
इन सबके कारण दिल्ली स्मॉग से ढक जाती है।
दिल्ली में प्रदूषण के वैज्ञानिक कारण
दिल्ली की भौगोलिक स्थिति: दिल्ली एक ऐसे क्षेत्र में स्थित है जो तीन तरफ़ से बंद है। सर्दियों में हवा की गति कम होने के कारण प्रदूषण ऊपर नहीं उठता।
- PM10 (धूल)
- PM2.5 (जहरीले सूक्ष्म कण)
दिल्ली में प्रदूषण की वर्तमान स्थिति
दिल्ली विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में लगातार शामिल है। यहां का AQI कई बार 500 से अधिक स्तर तक पहुँच जाता है, जो “गंभीर” श्रेणी से भी आगे है। सर्दियों में स्थिति सबसे भयावह होती है क्योंकि हवा रुक जाती है और प्रदूषक ऊपर उठ नहीं पाते। PM2.5 और PM10 कण WHO की सीमा से दस गुना तक बढ़ जाते हैं।
- दिल्ली का प्रदूषण दुनिया में सबसे चिंताजनक माना जाता है। अनेक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और विभिन्न AQI मॉनिटरिंग सिस्टम के अनुसार, दिल्ली लगातार उन शहरों में शामिल रहती है जिनकी हवा सबसे अधिक दूषित होती है। दिल्ली में औसत PM2.5 और PM10 का स्तर WHO की सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक दर्ज होता है।
- सर्दियों में जब तापमान गिरता है, हवा की गति धीमी हो जाती है, और आसपास के राज्यों से पराली जलाने का धुआँ आता है तो स्थिति और अधिक बिगड़ जाती है। नवंबर–दिसंबर में AQI अक्सर 400 से 800 के बीच दर्ज किया जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए “गंभीर” या “आपातकालीन” श्रेणी में आता है।
- दिल्ली की लगभग 2 करोड़ से अधिक आबादी लगातार ऐसी हवा में सांस लेती है जो फेफड़ों और हृदय के लिए अत्यंत ख़तरनाक है। WHO के अनुसार, ऐसी हवा में रहने से जीवन प्रत्याशा में भी कमी हो सकती है। यह स्थिति दिल्ली की आर्थिक गतिविधियों, शिक्षा प्रणाली, पर्यटन और स्वास्थ्य संसाधनों पर भी भारी दबाव डालती है।
दिल्ली में प्रदूषण के प्रमुख कारण
वाहन प्रदूषण – 40% तक योगदान: दिल्ली भारत का सबसे व्यस्त महानगर है जहाँ करोड़ों वाहन रोज़ सड़क पर दौड़ते हैं। इतने वाहनों से निकलने वाला धुआँ, CO₂, NOx, SO₂ और कणीय पदार्थ (PM) हवा को अत्यधिक दूषित करते हैं।
- दिल्ली में प्रतिदिन लाखों कारें और दोपहिया सड़क पर निकलते हैं।
- जाम में खड़े वाहनों से अत्यधिक CO, NOx और PM कण निकलते हैं।
- ट्रैफिक जाम, बार-बार गाड़ी रोकना
- पुरानी डीज़ल गाड़ियाँ, इनसे अत्यधिक PM2.5 और CO2 हवा में घुलती है।
- निजी कारों का बढ़ता उपयोग
- कम सार्वजनिक परिवहन
- हर घर में कई वाहन, जाम
- औद्योगिक प्रदूषण
निर्माण धूल – PM10 का सबसे बड़ा स्रोत: दिल्ली निरंतर निर्माणाधीन शहर है। इसलिए हर समय कहीं न कहीं मेट्रो निर्माण, फ़्लाईओवर, नई इमारतें, सड़क निर्माण होता रहता है, इनसे दिनभर धूल उड़ती है जिससे PM10 कण का स्तर बेहद बढ़ जाता है मुख्य कर्क हैं—
- धूल, सीमेंट कण
- पत्थर के बारीक कण
- साउंड प्रदूषण
- मेट्रो निर्माण, बिल्डिंग निर्माण
- नई सड़कें, फ्लाईओवर
पराली जलाना: हर साल अक्टूबर–नवंबर में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में किसानों द्वारा पराली जलाई जाती है। इस इससे लाखों टन धुआँ दिल्ली की ओर बहता है। जलन से निकलने वाला धुआँ तेज़ हवा की मदद से दिल्ली की ओर आता है। पराली जलने से घना धुआँ, जहरीले तत्व दिल्ली में आकर हवा को बदतर बना देते हैं। यह धुआँ PM2.5 कणों से भरपूर होता है। यह कई दिनों तक वातावरण में फैला रहता है। दिल्ली पर इसका प्रभाव गंभीर होता है क्योंकि हवा की गति कम होने के कारण प्रदूषक ऊपर उठ नहीं पाते।
क्यों पराली जलाना बढ़ा?
- मशीनों से कटाई
- पराली को हटाने का आसान तरीका
- लागत कम
- उचित विकल्प की कमी
कचरा जलाना (Garbage Burning): दिल्ली के लैंडफिल (गाज़ीपुर, भलस्वा, ओखला) में कई बार आग लग जाती है, जिससे जहरीली गैसें निकलती हैं। दिल्ली में तीन बड़े कचरा लैंडफिल मौजूद हैं—
- ग़ाज़ीपुर
- ओखला
- भलस्वा
जल प्रदूषण: यमुना नदी दिल्ली में 22 किलोमीटर बहती है लेकिन इसमें गिरने वाले नालों, सीवेज, औद्योगिक कचरे और प्लास्टिक के कारण पानी अत्यंत गंदा हो चुका है। यमुना का पानी अत्यंत गंदा है क्योंकि सीवेज, नाले और औद्योगिक कचरा इसमें गिरता है।
ध्वनि प्रदूषण: वाहनों की हॉर्न, ट्रैफिक जाम, मेट्रो निर्माण, लाउडस्पीकर, जेनरेटर और औद्योगिक मशीनें लगातार शोर पैदा करती हैं। दिल्ली में कई जगहों पर ध्वनि स्तर WHO की सुरक्षित सीमा से बहुत ज्यादा होता है। हॉर्न, जेनरेटर, निर्माण मशीनें, लाउडस्पीकर दिल्ली में शोर स्तर WHO की सीमा से कहीं ऊपर रहता है। लंबे समय तक तेज़ ध्वनि से निम्न कष्ट होते हैं—
जनसंख्या और घनत्व: दिल्ली एक अत्यधिक घनी आबादी वाला इलाक़ा है।
- बड़ी आबादी का मतलब अधिक ईंधन उपयोग
- अधिक वाहन, अधिक कचरा
- अधिक ऊर्जा की मांग, अधिक निर्माण
भूमि प्रदूषण: लैंडफिल और खुले में फेंका गया कचरा भूमि को बंजर बना देता है। केमिकल कचरा, मेडिकल वेस्ट, प्लास्टिक सभी भूमि की उर्वरता को नष्ट करते हैं।
औद्योगिक प्रदूषण: दिल्ली–NCR में हजारों छोटे और बड़े उद्योग हैं, जो कोयला, डीज़ल, लकड़ी और रसायन का उपयोग करते हैं।कुछ उद्योग अत्यधिक प्रदूषक होते हैं:
जैसे:
- पेंट इंडस्ट्री, रबर
- प्लास्टिक, मेटल पॉलिश
- ईंट भट्टे
दिल्ली में प्रदूषण का स्वास्थ्य पर प्रभाव
फेफड़ों से संबंधित बीमारियाँ:
- अस्थमा, ब्रोंकाइटिस
- फेफड़ों का संक्रमण
- फेफड़ों की क्षमता कम होना
- आँखों में जलन
- आंतरिक शारीरिक कमजोरी
हृदय संबंधी रोग:
- दिल का दौरा
- हाई ब्लड प्रेशर
- हाइपरटेंशन
बच्चों पर प्रभाव:
- दिमागी विकास में रुकावट
- फेफड़ों की ग्रोथ रुक जाना
- एलर्जी
- बार-बार सर्दी–खांसी
- फेफड़ों का विकास रुकना
- एलर्जी
- ध्यान एवं मस्तिष्क विकास पर असर
- थकान, सिरदर्द
- कम ऊर्जा, नींद की समस्या
- आंखों की समस्या
- खेल और दौड़ने की क्षमता कम
बुजुर्गों पर प्रभाव: प्रदूष्ण का कुप्रभाव हमारे बुजुर्गों पैर भी पड़ता है, जिससे निम्न प्रकार के रोगों का खतरा बढ़ जाता है
- COPD
- डायबिटीज का बिगड़ना
- सांस में तकलीफ
- हार्ट रोग बढ़ना
दीर्घकालीन प्रभाव:
- कैंसर का खतरा
- फेफड़ों में स्थायी क्षति
- हृदय रोग, ब्रोंकाइटिस
- पर्यावरण पर प्रभाव
पेड़ों और पौधों पर असर:
- पत्तियों पर धूल जमना, प्रकाश संश्लेषण प्रभावित, पौधों की बढ़त रुकना
- जानवरों के फेफड़े खराब होते हैं
- मौसम चक्र असंतुलित, गर्मी बढ़ती है
- मिट्टी की गुणवत्ता गिरती है
- तापमान बढ़ता है, मौसम असंतुलन
दिल्ली व भारत सरकार द्वारा समस्या से निपटने हेतु उठाए गए कदम
ऑड-ईवन योजना: वाहन संख्या कम करने के लिए लागू की गई। ऑड और ईवन नंबर वाली कारें अलग-अलग दिनों पर चलती हैं। इससे वाहन प्रदूषण में कमी आती है।
ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP): प्रदूषण स्तर के आधार पर विभिन्न कदम उठाए जाते हैं—
- निर्माण कार्य बंद
- स्कूल बंद
- डीज़ल गाड़ियाँ रोकना
- जेनरेटर रोकना
स्मॉग टावर: हवा को फ़िल्टर करने के लिए कुछ स्थानों पर एयर प्यूरीफाइंग टावर लगाए गए हैं जो हवा साफ करते हैं।
CNG बसें और इलेक्ट्रिक वाहन: दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन अधिकतर CNG आधारित है। दिल्ली में विश्व की पहली CNG बसों को लागू किया गया था। अब इलेक्ट्रिक बसों और ई-व्हीकल्स को बढ़ावा दिया जा रहा है।
निर्माण स्थलों पर सख्त नियम:
- धूल रोकने के लिए पानी छिड़काव
- नेटिंग, कवरिंग
- भारी जुर्माने
- धूल रोकने हेतु पानी
- ग्रीन नेट, CCTV मॉनिटरिंग
यमुना सफाई परियोजना: सीवेज और नालों को रोकने के लिए नई परियोजनाएँ चल रही हैं।
- सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट
- नालों का पानी रोकना
- ·नालों को ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ना।
- औद्योगिक कचरे पर नियंत्रण
समाधान
- पराली का स्थायी विकल्प
- Happy Seeder
- बायो-डीकोम्पोजर
- मेट्रो, बसें, इलेक्ट्रिक वाहन।
- पेड़ और हरित क्षेत्र बढ़ाना
- निर्माण धूल पर कड़ी निगरानी
- कचरा प्रबंधन में सुधार
- उद्योगों में साफ़ ईंधन का उपयोग
- लोगों की जागरूकता
जनता की भूमिका: सरकार अकेले प्रदूषण नहीं रोक सकती। जनता की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, हर नागरिक को इन बातों का पालन करना चाहिए—
- दोपहिया–चारपहिया का कम उपयोग, कारपूल
- कचरा न जलाना, बिजली बचाना
- घर में पौधे लगाना, खुले में कचरा न जलाना
- पर्यावरण नियमों का पालन
- एयर प्यूरीफायर का उपयोग
भविष्य की चुनौतियाँ
- पराली जलाने पर रोक, वाहनों की संख्या कम करना
- इंडस्ट्री का आधुनिकीकरण, कचरा निस्तारण
- हरित क्षेत्र बढ़ाना, जनसंख्या लगातार बढ़ रही है
- वाहन संख्या बढ़ रही है
- औद्योगिक गतिविधियाँ बढ़ती जा रही हैं
- शहरीकरण तेज़ी से हो रहा है




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