ईद का चाँद

कोरोना के साये में ईद का चाँद देखते लोग, बदली हुई ईद की झलक

भूमिका:

भारत में आज ईद का चाँद नज़र गया है और कल जुमे के दिन, यानी 14 मई, ईद मनाई जाएगी। लेकिन इस बार ईद की यह खुशी भी कोरोना महामारी के उस मनहूस साये में है, जिसने बीते दो वर्षों से इंसानी ज़िंदगी के हर रंग को फीका कर दिया है। ईद का चाँद हमेशा खुशियों, मिलन और उत्सव का संदेश लेकर आता है, मगर इस बार वही चाँद दिलों में एक अजीब-सी उदासी भी छोड़ गया है।

ईद का चाँद इस बात की घोषणा करता है कि रमज़ान का पवित्र महीना समाप्त हो गया है। यह महीना सब्र, इबादत, त्याग और आत्मसंयम का प्रतीक होता है। इस्लामिक कैलेंडर में हर महीने की शुरुआत चाँद देखने से होती है, लेकिन मुस्लिम समाज में ईद के चाँद को देखने की खुशी और उत्साह सबसे अलग होता है। यह सिर्फ़ एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि भावनाओं, परंपराओं और रिश्तों से जुड़ा एक पवित्र अवसर है।

 इस्लामिक कैलेंडर और चाँद का धार्मिक महत्व:

इस्लामिक कैलेंडर पूरी तरह से चंद्रमा पर आधारित है। हर नया महीना नए चाँद के दिखाई देने से शुरू होता है। रमज़ान, शाबान, मुहर्रम या रबी-उल-अव्वलहर महीने के चाँद का अपना धार्मिक महत्व है। लेकिन ईद का चाँद इन सबमें विशेष होता है, क्योंकि यह इबादत के पूरे महीने के समापन और इनाम के दिन की घोषणा करता है।

ईद का चाँद यह याद दिलाता है कि रोज़ों के दौरान रखे गए सब्र, भूख-प्यास की तकलीफ, और अल्लाह की इबादत अब अपने मुकाम तक पहुँच चुकी है। यही कारण है कि ईद का चाँद देखते समय आँखों में खुशी और दिल में सुकून एक साथ उतर आता है।

कोरोना से पहले का ईद का चाँद: एक यादगार दृश्य

कोरोना महामारी से पहले तक, रमज़ान के 29वें रोज़े की शाम का नज़ारा कुछ और ही होता था। जैसे ही सूरज ढलता, लोग अपनी-अपनी छतों पर या किसी ऊँची जगह पर इकट्ठा होने लगते थे। बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, सभी की निगाहें आसमान पर टिकी होती थीं।

फिर शुरू होती थी चाँद देखने की एक अनोखी प्रतियोगिता।

किसी को लगता—“इधर देखो, चाँद नज़र रहा है!”

कोई कहता—“नहीं-नहीं, ज़रा उधर देखो!”

तो कोई उत्साह में बोल उठता—“थोड़ा ऊपरथोड़ा नीचे!”

कुछ मिनटों तक यह मज़ेदार बहस चलती रहती थी। हर कोई चाहता था कि वही पहला इंसान बने जो ईद का चाँद देखे। यह होड़ सिर्फ़ चाँद देखने की नहीं होती थी, बल्कि खुशी को सबसे पहले महसूस करने की चाह होती थी।

कोरोना महामारी के कारण सुनसान छतें और ईद का चाँद


सबसे पहले चाँद देखने की खुशी:

असल में सबसे पहले चाँद देखने की खुशी ही कुछ और होती थी। जिस व्यक्ति की आँखों ने सबसे पहले चाँद को पकड़ लिया, उसकी नज़र की तेज़ी और सटीकता की तारीफ़ की जाती थी। मज़ाक-मज़ाक में उसेतेज़ नज़र वालाभी कहा जाता था। 

हालाँकि रमज़ान के खत्म होने का एक हल्का-सा दुख भी होता था, क्योंकि यह महीना आत्मिक शांति और अल्लाह की क़रीबी का एहसास कराता है। लेकिन जैसे ही चाँद नज़र आता, वह उदासी ईद की खुशियों में बदल जाती। दिल में यह उम्मीद जगती कि अल्लाह हमें अगले साल फिर रमज़ान नसीब करेगा।

चाँद के दिखते ही हर ओर सेईद मुबारककी आवाज़ें आने लगती थीं। फोन कॉल्स, संदेश और मुलाक़ातेंसब कुछ एक साथ शुरू हो जाता था।

चाँद से जुड़ी सामाजिक और पारिवारिक परंपराएँ:

ईद के चाँद से जुड़ा एक बहुत सुंदर संस्कार यह भी है कि चाँद देखकर जब लोग घर लौटते थे, तो सबसे पहले अपने बड़ों को सलाम करते थे। दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता, भाई-बहनसबसे दुआएँ ली जाती थीं। यहाँ तक कि पड़ोस के बुज़ुर्गों को भी इस खुशी के मौके पर नहीं भूला जाता था।

अगर परिवार का कोई सदस्य घर से दूर, परदेस में होता, तो वह भी फोन के ज़रिए सलाम और मुबारकबाद ज़रूर भेजता।

ये छोटी-छोटी परंपराएँ ही ईद को सिर्फ़ त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों का उत्सव बनाती थीं।

कोरोना ने बदल दी ईद की तस्वीर:

लेकिन इस बार कोरोना वायरस के आतंक ने इंसानी ज़िंदगी की हर गतिविधि पर जैसे ब्रेक लगा दिया है। स्कूल बंद, बाज़ार सूने, मस्जिदों में पाबंदियाँऔर ईद का चाँद भी इससे अछूता नहीं रहा।

इस बार तो वह उत्साह है, वह भीड़, और ही वह हँसी-ठिठोली। ईद के चाँद को देखने का जोश अब केवल धार्मिक कर्तव्य की पूर्ति तक सिमट कर रह गया है।

मैं भी जब इस बार चाँद देखने छत पर गया, तो वहाँ सिर्फ़ मैं और मेरा बेटा मौजूद थे। आसपास की छतों पर नज़र दौड़ाई तो इक्का-दुक्का लोग ही दिखाई दिए। कुछ ही देर में चाँद नज़र गया, लेकिन दिल बहुत भारी हो गया।

अकेलेपन में देखा गया चाँद:

सोचने लगाकहाँ वह समय था जब दर्जनों लोगों के साथ चाँद देखने का आनंद आता था, और कहाँ आज यह हाल कि सिर्फ़ अपने बेटे के साथ खड़े हैं। चाँद तो वही है, उसकी रोशनी भी वही है, लेकिन खुशियों का माहौल गायब है।

उस पल दिल से बस एक ही दुआ निकली

मेरे रब, इस कोरोना को इस दुनिया से हमेशा के लिए खत्म कर दे। फिर कभी ऐसी सुनसान ईद देखने को मिले।

ईद का चाँद: उम्मीद की किरण:

हालाँकि हालात मुश्किल हैं, लेकिन ईद का चाँद आज भी हमें उम्मीद का संदेश देता है। यह याद दिलाता है कि अंधेरी रात के बाद उजाला ज़रूर आता है।

शायद आने वाले समय में फिर वही रौनक लौटे, फिर वही छतों पर भीड़ हो, फिर वही हँसी-मज़ाक गूँजे।

निष्कर्ष:

ईद का चाँद सिर्फ़ एक तारीख़ बदलने का संकेत नहीं है, बल्कि यह इंसानी जज़्बातों, परंपराओं और आस्था का प्रतीक है। कोरोना ने भले ही हमें दूर कर दिया हो, लेकिन दिलों को जोड़ने की ताकत आज भी इस चाँद में मौजूद है। आइए, इस ईद पर हम सब यह दुआ करें कि दुनिया जल्द इस महामारी से उबरे और फिर से ईद की खुशियाँ, मेल-मिलाप और रौनक लौट आए।

 

ईद मुबारक। चाँद मुबारक।


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5 टिप्पणियाँ

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Unknown
admin
14 मई 2021 को 6:19 am बजे ×

भौत्त अच्छा लिखा है आपके विचार अच्छा है
आपने जो आर्टिकल लिखा है bhaut ही बढ़िया है आपको ईद मुबराक हो और आपसे निवेदन है की आप ऐसे आर्टिकल लिखते रहे

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